एक में भी अनेक हो
तुम
तुम से है, पहचान हमारी
तुम्हें देखती दुनिया
सारी ।
ज्ञान के नन्हें दीप
तुम
सूर्य के नन्हें प्रतीक तुम
वक्त के साथ बढ़ना है
,
उच्च शिखर पर चढ़ना है ।
अंजली भर सपने बटोर
रहे
हर सपना सच करना है
दूर बहुत चलना है,
पथिक
हौसलाऔर बुलन्द करना
है ।
चाहत की तस्वीर हो
तुम
भारत की तकदीर हो तुम
बुलंदी के उस पार जाना
है
सारा जाहाँ जगाना है
।
न होना निराश कभी तुम
न खोना विश्वास कभी
तुम
सिर्फ हाथ भर की दूरी
है
छूने को आसमां है ।
नित नया निर्माण करो
तुम
कण-कण में प्राण भरो
तुम
नव चेतन जोत जगाना
है
नव भारत तुम्हें बनाना
है ।
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महेश्वरी कनेरी
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